एल-नीनो का सबसे खतरनाक रूप दिखेगा – भारतीय कृषि पर गंभीर संकट

भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने चेतावनी दी है कि इस बार का एल-नीनो सबसे खतरनाक रूप में दिखेगा। देश के विभिन्न हिस्सों में बारिश के पैटर्न में बड़ा बदलाव आने वाला है, जिससे कृषि पर गंभीर असर पड़ सकता है। किसानों को अगले महीनों में मानसून की विफलता के लिए तैयार रहना चाहिए।

**एल-नीनो क्या है?**

नासा की रिपोर्ट के अनुसार, एल-नीनो एक जलवायु पैटर्न है जो प्रशांत महासागर में गर्म जल के तापमान में वृद्धि से उत्पन्न होता है। यह प्राकृतिक जलवायु चक्र भारत के मानसून को प्रभावित करता है और वर्षा की मात्रा को कम कर सकता है।

जब प्रशांत महासागर में जल का तापमान सामान्य से 0.5 डिग्री सेल्सियस अधिक होता है, तो इसे एल-नीनो की स्थिति माना जाता है। वर्तमान में, महासागर का तापमान सामान्य से 1.5-2 डिग्री अधिक है, जो 2015-2016 के महान एल-नीनो के करीब है।

**भारतीय कृषि पर असर**

कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, भारतीय कृषि मानसून पर 70% निर्भर है। एल-नीनो के कारण मानसून कमजोर होने से देश के 60% क्षेत्र में सूखा पड़ सकता है। यह विशेषकर महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में गंभीर समस्या बन सकता है।

जागरण की रिपोर्ट में कहा गया है कि सिंचाई सुविधाओं के बिना किसानों की फसलें प्रभावित होंगी। दलहन, तिलहन और कपास की खेती सबसे ज्यादा खतरे में है क्योंकि ये फसलें अच्छी बारिश पर निर्भर करती हैं।

**2015-2016 का अनुभव**

2015-2016 में भारत का सूखा एल-नीनो के कारण हुआ था। उस समय मानसून सामान्य से 24% कम हुआ था, जिससे कृषि उत्पादन में 9% की गिरावट आई थी। उस साल किसान आत्महत्याओं में भारी वृद्धि दर्ज की गई थी।

आज तक की जांच में पाया गया कि उस वर्ष बिजली की खपत में 35% वृद्धि हुई क्योंकि किसानों को अधिक सिंचाई पर निर्भर होना पड़ा। यह राज्य के बिजली बिलों को लाखों में बढ़ गई।

**सरकारी तैयारी**

कृषि मंत्री शिवराज सिंह ने कहा है कि सरकार इस बार के एल-नीनो के लिए पहले से राहत योजनाएं तैयार कर रही हैPM कृषि सिंचाई योजना के तहत सूखा प्रभावित इलाकों में सिंचाई सुविधा बढ़ाई जा रही है

जागरण की रिपोर्ट में बताया गया है कि सरकार 50,000 करोड़ रुपये के बजट के साथ बोरवेल और तालाब निर्माण में निवेश कर रही है।

**किसानों के लिए सुझाव**

ICAR विशेषज्ञ ने किसानों को सूखा सहन करने वाली किस्मों की खेती करने की सलाह दी है। दलहन और तिलहन के बजाय मोटे अनाज जैसे ज्वार, बाजरा और रागी की खेती पर ध्यान देना चाहिए।

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, मल्च का उपयोग करके जल संरक्षण किया जा सकता है। ड्रिप सिंचाई तकनीक से भी 30-40% पानी बचाया जा सकता है

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